5.13.2008

उग आती हैं बे‍टियाँ

बोये जाते हैं बे‍टे
और उग आती हैं बे‍टियाँ
खाद पानी बेटों में
और लहलहाती हैं बे‍टियाँ
एवरेस्ट की ऊंचाइयों तक, ठेले जाते हैं बेटे
और चढ जाती हैं बे‍टियाँ
कई तरह गिरते हैं बेटे
और संभाल लेती हैं बे‍टियाँ
सुख के स्वप्न दिखाते बेटे
जीवन का यथार्थ बे‍टियाँ
जीवन तो बेटों का है
और मारी जाती हैं बे‍टियाँ।

यह कविता मैंने अपने फैमिली डाक्टर डा0 राकेश कुमार के दवाखाने में टंगे एक पोस्टर में पढ़ी, जिसे किसी दवा बनाने वाली कंपनी ने सेव चाइल्ड के नारे के साथ प्रकाशित किया था। पोस्टर में कविता के लेखक का नाम नहीं छपा हुआ था।
इस कविता ने मुझे अन्दर तक छू लिया और मुझे लगा कि कन्या भ्रूड़ हत्या के विरोध में सामाजिक चेतना जगाने के लिये गढ़े गये सैकड़ों नारों की तुलना में यह कविता कहीं ज्यादा सार्थक है।
आपका क्या विचार है?

6 सुधी पाठकों की राय:

कंचन सिंह चौहान said...

satya evam sundar

ऋचा said...

अच्छी लगी यह कविता बिल्कुल यथार्थ के क़रीब
ऋचा

अनिल रघुराज said...

यह मशहूर कविता नन्द किशोर हटवाल की है, जो बेटियों के ब्लॉग पर इसी साल जनवरी में पेश की गई है। कविता वाकई इतनी अच्छी है कि पोस्टर बनने लायक है।

Udan Tashtari said...

जी, बेटियों के ब्लॉग पर पढ़ी थी. बहुत ही सुन्दर कविता है. आभार इसे पुनः पेश करने का.

महामंत्री (तस्लीम ) said...

अनिल जी, रचनाकार का नाम बताने के लिए धन्यवाद।
मैं नन्द किशोर हटवाल जी को मुबारकबाद देता हूं, इस खूबसूरत कविता के लिए। आशा है भविष्य में भी वे इसी प्रकार की सार्थक रचनाओं का सृजन करते रहेंगे और हम जैसी पाठकों को भावविभोर करते रहेंगे।

googol said...

वाकई, समाज का एक क्रूर आइना पेश करती पंक्तियाँ ... दिल को छू गई|