7.06.2009

ज्योतिषी कैसे ठगते हैं? How do astrologers deceive public?

सिगमंड फ्रायड तथा अन्य प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक यह समझते हैं कि हर एक व्यक्ति “महान” या “महत्वपूर्ण” हस्ती बनने की इच्छा रखता है। व्‍यक्ति की इस इच्छा को भिन्न-भिन्न ढ़ंगों से विकसित करते हैं। जबकि कई व्यक्तियों में ऐसी इच्छा बिलकुल नहीं होती। कई व्यक्ति महान बनने के लिए ईमानदारी से काम लेते हैं जबकि कईअन्य इसकी पूर्ति के लिए बेईमानी से भरपूर ढंग तरीके प्रयोग करते हैं। इस प्रकार से वयक्ति दिनों या घंटों में ही महान बन सकता है जबकि ईमानदार से व्यक्ति को लम्बा समय महान बनने में लग सकता है।

अब्राहम लिंकन के अचेत मन के किसी कोने में महान बनने के लिए इच्छा छुपी हुई थी। वह एक साधारण क्लर्क होते हुए भी अमरीका का राष्ट्रपति बनना चाहता था। महात्मा गांधी तथा मद टेरेसा ने महान बनने के लिए भिन्न प्रकार का मार्ग अपनाया। पाकिस्तानी जनरल जिया उल हक तथा फिजी के जनरल रामबुका ने महान बनने के लिए बेईमानी के रास्ते अपनाए तथा वह घंटों में ही महान बन गये।

आस्ट्रेलिया के पूंजीपति एलन ब्रांड तथा कैरी पैकर और भारत के टाटा बिड़ना ने महाने बनने के लिए इनसे भिन्न मार्ग चुना। स्त्रियों द्वारा मनमोहक डिजायनों के कपड़े तथा गहने पहनना तथा संवरना भी उनकी अंदरूनी इच्छा होती है, दूसरों को अपनी ओर अकर्षित करने की इच्छा का ही एक प्रदर्शन होता है। इस पुस्तक को लिखने का कई कारणों में एक समाल में महत्वपूर्ण व्यक्ति बनना भी है।

इतिहास के पन्ने प्रसिद्ध व्यक्तियों के महान बनने की भावना के लिए किए गये संघर्षों की गाथाओं से भरे पड़े हैं। जो लोग अपने नामों के साथ संत, भगवान, गुरू, महाराज तथा श्रीमान आदि जैसे शब्द जोड़ लेते हैं, वह एक प्रकार से महान बनने की लालसा को ही पूरा करते हैं।

मर्सिडीज़ या मारूती कार, बड़ा सा शाही ठाठ वाला बंगला लेने, अफसर बनने तथा कीमती पोशाकों तथा हीरे जवाहरातों से जड़े आभूषण पहनने में भी हमारी महान बनने की इच्छा झलकती है। इस प्रकार पेशेवराना तथा शौकिया किस्मत बताने वाले भी यह पेशा इसलिए अपनाते हैं ताकि उनके महान बनने की इच्छा पूरी हो सके। अन्य पेशों में लगे हुए लोगों की तरह किस्मत बताने वाले भी अपने कारोबार को चमकाने के लिए उन सभी ढ़ंगों को अपनाते हैं, जिनसे उनका धंधा आधुनिक दिखाई दे। कम्प्यूटर को इसमें प्रयोग करना यही दर्शाता है।

अन्य कारोबारों तथा किस्मत बताने वालों के धंधें में अन्तर होता है। पहली प्रकार के लोग पैसे के बदले ग्राहक को कुछ देते हैं पर किस्मत बताने वाले कुछ भी नहीं देते। वह अपने ग्राहकों को बुद्धू बना कर अंधविश्वासी बना देते हैं। किस्मत देखने वाले लोगों को धोखा देने तथा उनकी अज्ञानता तथा भोलेपन के साथ-साथ उनकी किस्मत में विश्वास का दुरूपयोग करने में काफी होशियार होते हैं।

किस्मत बताना उतना ही सरल है, जितना कार चलाना। इस काम में किसी विशेष योग्यता की आवश्यकता नहीं पड़ती। शारीरिक परिश्रम करने वाले मज़दूर से लेकर बहुत ज्यादा पढ़े-लिखे व्यक्ति तक कोई भी चालाक व्यक्ति किस्मत बताने वाला बन सकता है। केवल मनोविज्ञान सम्बंधी साधारण ज्ञज्ञन की पुस्तक पढ़ना तथा इस ज्ञान को उपयुक्त ढंग से प्रयोग करना ही ज्योतिष सीखना है। सबसे पहले यह काम अपने दोस्तों, सहपाठियों तथा रिश्तेदारों से आरम्भ करना चाहिए। किसी अखबार या रिसाले के सम्पादक से सम्बंध स्थापित करना या कमीशन तक करने की कोशिश की जानी चाहिए।

केवल दो या तीन लेख लिखकर ही वह आपको अन्तर्राष्ट्रीय प्रसिद्धि वाला किस्मत बताने का विशेषज्ञ स्थापिक कर सकते हैं। फिर जल्दी ही आप छठी इन्द्री या इलाही वाणी होने का दावा करके अपनी दुकान खोलने के लिए परिपक्त बन जाएंगे। आप यह भी दावा कर कसते हैं कि प्रधानमंत्री, मन्त्री, डॉक्टर, वकील, फिल्मी सितारे तथा संगीतकार, महान हस्तियाँ आपके ही ग्राहक हैं। आप किसी हवाई दुर्घटना के बारे में, भूचाल आने के बारे में, राष्ठ्रपति, तानाशाह या प्रधानमंत्री के कत्ल किये जाने के बारे में भविष्यवाणी करने का दावा भी कर सकते हैं। इनके सच्चे होने की कर्त चिंता न करें। कौन सी बात में किसी ने जांच पड़ताल करनी है।

ग्राहक जो सुनना पसंद करता है, किस्मत बताने वाले उसे वही कुछ बताने का प्रयास करते हैं। वह व्यक्ति की शारीरिक तथा मानसिक कमज़ोरियों के विषय में जानते हैं। कौन यह सुनना पसंद नहीं करता कि आने वाले चंद रोज़ उसकी इज्जत तथा दौलत में वृद्धि करेंगे? हर एक व्यक्ति अपनी असफलताओं की जुम्मेवारी किस्मत को ठहराना चाहता है। यह सुनना अधिक संतोष देता है कि आप अपने जीवन साथी से इसलिए वंचित हुए हैं क्योंकि आपके ग्रह अशुभ थे या आपकी शादी अशुभ मुहुर्त में हुई थी। कोई भी यह नहीं सुनना चाहेगा कि यह दुर्घटना आपके व्यक्तित्व की कमजोरी या आपकी किसी मूर्खतापूर्ण कार्यवाही के कारण घटी है।

कितना अच्छा लगता है ‍यह सुनना कि आपकी निर्धनता आपकी जीवन योजना में गलती होने के कारण नहीं बल्कि जन्म गलत समय में होने के कारण है। किस्मत बताने वाले, व्यक्ति के लक्षणों के जानकार होते हैं तथा वे जानते है कि हर व्यक्ति प्यार, घृणा, गुस्सा, दयालुता, जिददीपन, डर, दुख, लालसा, खुशी, मित्रता तथा घमण्ड जैसी भावनाएं मौजूद हैं तथा किस्मत बताते समय इन्हीं भावनाओं की जानकारी होने से वह अच्छा कमा लेते हैं।

यह एक विश्वव्यापी सच्चाई हे कि लोग अपने बारे में की गयी भविष्यवाणियाँ लम्बे समय तक याद नहीं रखा करते। वह भविष्यवाणियों की जांच पड़ताल करने की इच्छा नहीं रखते। वह केवल सच्ची भविष्यवाणियों को याद रखते हैं जबकि झूठी भविष्यवाणियों को भूल जाते हैं। इसके अतिरिक्त वह संयोगवश घटी सच्ची घटना को बढ़ा-चढ़ा कर देखते हैं।

किस्मत बताने वाले मौका परस्त होते हैं तथा वे इस ढंग से बातचीत करते हैं कि उनके द्वारा की गयी भविष्यवाणी को कई तरह से समझा जा सकता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि वह जाने हैं कि उनके ग्राहक भोले भाले तथा अंधविश्वासी हैं।
मनजीत सिंह बोपाराय
(ज्योतिष झूठ बोलता है, पृष्ठ-110, तर्कभारती प्रकाशन, बरनाला, पंजाब से साभार)
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7.03.2009

सर्वमनोकामना पूर्ति मंत्र

क्‍या आप एक अदद नौकरी की तलाश में हैं?
क्‍या आप किसी लड़की से प्‍यार करते हैं और उसे पाना चाहते हैं?
क्‍या आपका कोई शत्रु आपको परेशान कर रहा है और आप उसे ठिकाने लगाना चाहते हैं?
क्‍या आप मनचाही सन्‍तान (विशेषकर लड़का) पाना चाहते हैं?
क्‍या आप किसी गड़े हुए धन की तलाश में हैं?

जी हॉं, ज्‍यादातर लोगों की यही अभिलाषाएँ होती हैं, जिनका ज्‍योतिषी, तांत्रिक और बाबा लोग फायदा उठाते हैं। चूँकि ज्‍यादातर लोग ईश्‍वर में अंध आस्‍था रखते हैं, इसलिए वे ऐसी शक्तियों में भी सहज ही विश्‍वास कर लेते हैं, जो कोई भी काम कर सकती है। ऐसे लोगों का मानना होता है कि संसार में अब भी बहुत से ऐसे दिव्‍य लोग मौजूद हैं, जो उनकी मनोभिलाषा पूरी कर सकते हैं। इसी चक्‍कर में वे बाबाओं, ज्‍योतिषियों और तांत्रिकों के चक्‍कर में पड़कर अपने समय, धन और शरीर का नाश करते रहते हैं। आश्‍चर्य का विषय यह है कि ऐसे लोग लगातार ठगते जाने के बावजूद भी अपनी धारणा को बदल नहीं पाते हैं और हर बार नये शिकारी की तलाश में भटकते रहते हैं।

पिछले दिनों ‘तस्‍लीम’ की मोहर बनवाने के सिलसिले में मेरा नज़ीराबाद जाना हुआ। लखनऊ की नज़ीराबाद से अमीनाबाद जाने वाली रोड़ पर दाईं ओर एक किताब की दुकान पर अचानक मेरी दृष्टि ठहर गयी। उसके पास एक किताब रखी हुई थी, जिसका शीर्षक था ‘मुस्लिम तन्‍त्र’। उत्‍सुकतावश मैंने किताब का दाम पूछा। और आश्‍चर्य का विषय यह कि हज़ारों कीमती मन्‍त्रों को एक जगह परोसने वाली किताब मात्र 30 रूपये में उपलब्‍ध थी।

किताब को उलटने पलटने पर पता चला कि इसे किसी ‘तांत्रिक बहल’ ने लिखा है, जिसका दावा है कि ये सिद्ध मंत्र हैं। किताब के पेज नं0 72 पर सर्व मनोकामना पूर्ति मंत्र लिखा हुआ है।
वह मंत्र इस प्रकार है-

‘व मग्‍यं यता बकल्‍लो अलल हैलाफ हुबा हसबुहू।’
इस मंत्र के बारे में लेखक का दावा है कि अगर कोई व्‍यक्ति आयतल कुर्सी के बाद दो हजार बार यह मंत्र लगातार 11 दिन पढ़े, तो उसका जो भी कार्य होगा, पूरा होगा।

इस मंत्र को पढ़ने के बाद मेरे मन में सवाल कौंधा कि क्‍या वास्‍तव में अगर इसके साथ बताई गयी विधि के अनुसार इसे पढ़ा जाए तो क्‍या वास्‍तव में बेरोजगार को नौकरी मिल सकती है? क्‍या कोई युवक मनचाही लड़की को प्राप्‍त कर सकता है? क्‍या अपने शत्रु का नाश किया जा सकता है? क्‍या मनचाही सन्‍तान (विशेषकर लड़का) प्राप्‍त की जा सकती है? क्‍या ज़मीन में गड़ा हुआ धन प्राप्‍त किया जा सकता है?

आपको क्‍या लगता है कि कोई मंत्र वास्‍तव में यह सब काम कर सकता है? मेरा दृढ़ विश्‍वास है कि इन तथाकथित मंत्रों, तंत्रों और यंत्रों के सहारे अगर कोई काम किया जा सकता है, तो वह है सिर्फ और सिर्फ लोगों को बेवकूफ बनाना।

आपकी इस बारे में क्‍या राय है? क्‍या आपके पास ऐसा कोई मंत्र है? क्‍या कभी किसी मंत्र, तंत्र अथवा यंत्र का उपयोग करके आपकी कोई मनोकामना पूर्ण हुई है?

यदि आपके पास ऐसा कोई विश्‍वसनीय मंत्र है, तो उसे ज़रूर बताएं। हालॉंकि मैं इन सब चीज़ों को सिरे से नकारता हूँ, पर फिरभी भारत के लाखों भूखे, नंगों को रोटी और कपड़ा पहुंचाने के लिए, देश की सड़ रही व्‍यवस्‍था से भ्रष्‍टाचार का खात्‍मा करने के लिए, असुरक्षित लोगों की जिन्‍दगी को बचाने के लिए, लाखों बहनों, बेटियों और मॉंओं की इज्‍जत की सुरक्षा के लिए और सम्‍पूर्ण विश्‍व में भारत की धाक को जमाने के लिए मैं उस मंत्र का प्रयोग करने के लिए तैयार हूँ।
चित्र साभार-http://www.yogaville.org/
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"साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" में पढें- 'खून देना क्या इतना मुश्किल होता है?'
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7.01.2009

भाग्‍यवाद को बढ़ावा देता भारतीय मीडिया Fortune Telling-Indian Media Hype

इन दिनों मीडिया, चाहे वह अखबार हो या इलेक्‍ट्रानिक मीडिया, ज्‍योतिष शास्‍त्र को इस तरह से पेश करने में लगा है, मानो वही सब कुछ है। अखबारों में जहां नए नए विषयों को ज्‍योतिष के सांचे में ढ़ालकर आकर्षक ढ़ंग से प्रस्‍तुत करने का प्रयास किया जा रहा है, वहीं न्‍यूज़ चैनलों में भविष्‍यवक्‍ता खुद को एक दूसरे से बेहतर एक्‍टर साबित करने की होड़ में नज़र आ रहे हैं। इससे पाठक और दर्शक इनकी ओर खिंचे ज़रूर चले आ रहे हैं, लेकिन साथ ही मीडिया की गंभीरता और उसकी भूमिका पर भी सवाल उठ रहे हैं।

यह सच है कि जैसे जैसे समाजों में सम्‍पन्‍नता आती जाती है, वैसे वैसे लोगों में अपने भविष्‍य को लेकर डर भी बढ़ता जाता है। भारतीय समाज में भी यही हो रहा है। सम्‍पन्‍नता के साथ व्‍यक्ति में भविष्‍य के प्रति भय बढ़ा है। जिसके फलस्‍वरूप उसका भाग्‍यवाद में यकीन बढ़ता जा रहा है। वह हर कार्य करने से पहले पंचांग देखने लगा है, मुहुर्त पूछने लगा है ताकि ‘अनुचित’ वक्‍त में काम करने से कहीं उसका भाग्‍य बिदक न जाए। यानी कर्म से उसका विश्‍वास डिगने लगा है। इसी का भयादोहन कथित ज्‍योतिषाचार्य कर रहे हैं। दुर्भाग्‍य की बात यह है कि सभी मीडिया बहती गंगा में हाथ धोने में पीछे नहीं हैं।

कुछ साल पहले तक ग्रह नक्षत्रों के प्रभाव कुप्रभाव की इतनी बातें नहीं होती थीं। केवल सूर्य ग्रहण व चंद्र ग्रहण के समय ही लोग आशंकित रहते थे, लेकिन आज तो आसमान की हर घटना को ज्‍योतिष के चश्‍मे से देखा जाने लगा है। अगर शुक्र धरती के पास आ रहा है, तो उसके अर्थ निकाले जाने लगते हैं। मंगल व बुध के बीच की दूरी कम हो रही है, तो मंगल अमंगल की बातें की जाने लगती हैं। यदि चंद्र ग्रहण या सूर्य ग्रहण हो रहा है, तो विभिन्‍न राशियों पर उसके सकारान्‍तक नकारात्‍मक असर और कथित अनिष्‍टकारी प्रभावों को कम करने के नुस्‍खे बताए जाने लगते हैं। 

अफसोस इस बात का है कि आज मीडिया में नक्षत्रीय घटनाक्रम पर वैज्ञानिक नज़रिए से चर्चा कभी नहीं होती, क्‍योंकि यह माना जाता है कि ऐसी चर्चाओं को लोग पढ़ना या देखना पसंद नहीं करते। इसलिए मीडिया में विज्ञान को उतना स्‍थान नहीं दिया जाता, जितना फलित ज्‍योतिष को दिया जाता है। हद तो तब हो जाती है, जब मीडिया उसी प्रकार की बातें करने लगता है, जिस प्रकार की बातें ग्रहण को लेकर हमारे बुजुर्ग अक्‍सर करते आए हैं। जैसे गर्भवती स्त्रियों के के लिए ग्रहण खतरनाक होता है, ग्रहण के दौरान कुछ भी खाना नहीं चाहिए, खाद्य सामग्री में तुलसी की पत्तियां रखकर उसे अपवित्र होने से बचाया जाना चाहिए, ग्रहण के तत्‍काल बाद स्‍नान करना चाहिए, आदि आदि। यहॉं एक सवाल यह उठता है कि क्‍या मीडिया काम वही पेश करना है जिसे लोग पढ़ना या देखना चाहते हैं या वह जो यथार्थ होता है?

भाग्‍यवादी होना सबसे आसान है और इसीलिए जब भाग्‍य की बातें की जाती हैं, तो उसमें रस आना स्‍वाभाविक है। मीडिया के लिए भी ऐसी बातें प्रकाशित या प्रसारित करना आसान होता है, जिनकी पुष्टि नहीं की जानी है। ज्‍योतिष ऐसा ही विषय है, जिससे सम्‍बंधित जानकारी पेश करने से पहले उसकी किसी भी प्रकार की जांच पड़ताल करने की ज़रूरत नहीं होती है और न ही बाद में इस बात का संज्ञान लिया जाना ज़रूरी समझा जाता है कि जो भविष्‍यवाणियॉं की गयी थीं, वे कितनी सच निकलीं। तो क्‍या मीडिया का दायित्‍व ज्‍योतिष सम्‍बंधी अधकचरी सामग्री पेश करने के बजाय यह नहीं होना चाहिए कि वह ग्रह नक्षत्रों को लेकर वैज्ञानिक नज़रिया पेश करे। लोगों में भाग्‍यवाद के वायरस छोड़ने के बजाए कर्मवादी बनने की प्रेरणा दे।

यह धारणा गलत है कि पाठक या दर्शक विज्ञान सम्‍ब्‍ंधी बातों को पढ़ने या देखने में रूचि नहीं लेते हैं। जेनेवा में हुए बिग बैंग थ्‍योरी के प्रयोग से सम्‍बंधित खबरे सबसे ज्‍यादा देखी और पढ़ी गयीं। दरअसल, पाठक व दर्शक की रूचि भी उन खबरों या सामग्री में बनती जाती है, जो अक्‍सर पेश की जाती है। अगर कोई खबर दिखाई ही नहीं जाएगी, तो भला उसमें पाठकों या दर्शकों की दिलचस्‍पी जागृत होगी भी कैसे। इसलिए सवाल रूचि अरूचि का नहीं है। तो मीडिया को क्‍या करना चाहिए?

ज्‍यातिष महज भविष्‍य की भाग्‍य आधारित कल्‍पना है, जबकि विज्ञान कर्मवाद पर आधारित वास्‍तविकता है। मनुष्‍य के कदम कदम पर विज्ञान मौजूद है, लेकिन विडम्‍बना यह है कि इसे पेश नहीं किया जा रहा है। यहां विज्ञान को पेश करने से मतलब महज विज्ञान सम्‍बंधी खबरों को पेश करना भर नहीं है। वास्‍तव में ज़रूरत वैज्ञानिक नज़रिए की है, जिसका सख्‍त अभाव नज़र आता है। यह मान लिया जाता है कि वैज्ञानिक नज़रिए से केवल विज्ञान सम्‍बंधी कार्य करने वाले लोग, जैसे वैज्ञानिक, विज्ञान विषय पढ़ाने वाले प्रोफेसर व शिक्षक और विज्ञान के शोधार्थी, का ही सरोकार है, आम जनता से इनका काई लेना देना नहीं है। चूंकि मीडिया खुद क आम जनता के निकट होने का एहसास दिलाने का प्रयास करना चाहता है, इसलिए विज्ञान की वह जानबूढकर उपेक्षा कर देता है।

सच तो यह है कि यदि आम जनता में भी वैज्ञानिक नज़रिए का विकास हो जाए, तो देश के सामने मौजूद कई सामाजिक समस्‍याओं का समाधान अपने आप हो जाएगा। वैज्ञानिक नज़रिए का मतलब धर्म से विमुख होना या भाग्‍य को पूरी तरह से नकारना भी नहीं है। कई वैज्ञानिक धार्मिक क्रिया कलापों के साथ भी वैसे ही जुड़े रहते हैं, जैसे विज्ञान के साथ। इससे उनकी जिंदगी में कोई विरोधाभाष पैदा नहीं होता है। ज़रूरत इसी वैज्ञानिक नज़रिए को उभारने की है। मीडिया, खासकर इलेक्‍ट्रानिक मीडिया का प्रभाव जग जाहिर है। मीडिया को इपने इसी प्रभाव व ताकत का इस्‍तेमाल लोगों में वैज्ञानिक नज़रिया विकसित करने व कर्मवादी बनने के लिए प्रेरित करने में करना चाहिए, न कि भविष्‍य वक्‍ताओं को पेश करके कूप मण्‍डूक बनने में।
-J. Aklecha
(साभार- एन0सी0एस0टी0सी0 कम्‍यूनिकेशन, दिसम्‍बर 2008)

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"साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" में पढें- 'गोत्‍फ्रेड विल्‍हेम लाइब्निज कौन है?'
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6.29.2009

क्‍या हम सिर्फ मिलावटी सामान खाने के लिए अभिशप्‍त हैं?

बीते एक सप्‍ताह में यह दूसरी बार हुआ है, जब लखनऊ में नकली तेल बनाने का कारखाना पकड़ा गया है। ज़हरीली सब्जियां, मिलावटी दूध की तरह ही तेल का यह खेल भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा था। हमेशा की तरह ही इस बार भी इस काले कारनामे के असली खिलाड़ी पकड़ से बाहर रहे हैं।

नकली तेल बनाने के लिए आम तौर से चावल की भूसी से तैयार किये जाने वाले तेल, जिसे राइस ब्रान ऑयल कहा जाता है, का इस्‍तेमाल किया जाता है। यह रंगहीन तेल होता है और खाने के लिए उपयोग में नहीं लाया जाता है। नकली तेल के कारोबारी इस तेल को सरसों के तेल में बदलने के लिए एक खतरनाक किस्‍म के रसायन का प्रयोग करते हैं।

बताया जाता है कि ऐसे तेल के 12 हजार लीटर में लगभग एक लीटर रसायन मिलाने पर राइस ब्रान ऑयल सरसों के तेल जैसा हो जाता है। इसके बाद इसमें खुश्‍बू के एसेंस मिलाए जाते हैं। इस तरह 35 रूपये लीटर में तैयार होने वाला यह तेल 65 से 70 रूपये तक में बेचा जाता है। इसके अलावा गुजरात और राजस्‍थान से आने वाला कचरा तेल भी कुछ व्‍यापारियों द्वारा इस्‍तेमाल किया जाता है। यह तेल खाने योग्‍य नहीं होता है। पर इसे खाने योग्‍य बनाने के लिए कानपुर की एक रिफाइनरी में बाकायदा साफ किया जाता है।

जाहिर सी बात है कि यह सब बड़े पैमाने पर और काफी समय से चल रहा है। और सबसे ज्‍यादा चिंताजनक बात यह है कि यह नकली तेल नामी कम्‍पनियों के लेबल के सहारे एक लम्‍बे समय से बेचा जाता रहा है।

हालॉंकि देखने में नकली तेल और असली तेल में बहुत ज्‍यादा फर्क नहीं होता है। लेकिन यदि हम थोड़ी सावधानी बरतें तो नकली तेल की पहचान आसानी से कर सकते हैं।

सरसों का तेल भारी होता है और उसमें काफी चिकनाई पाई जाती है। यदि सरसों के तेल को पारदर्शी शीशी में भरकर निकाला जाए, तेल की एक पर्त शीशी में काफी देर तक चिपकी रहती है।

सरसों के तेल में काफी चिकनाई पायी जाती है। यदि उसे हाथ पर रगड़ा जाए, तो त्‍वचा पर चिकनापन काफी देर तक बना रहता है। जबकि नकली तेल में यह चिकनाई काफी कम होती है।

सरसों के तेल को यदि हाथ में लेकर रगड़ा जाए, तो इससे उसकी महक पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, जबकि नकली तेल के साथ ऐसा करने पर उसकी महक समाप्‍त हो जाती है।

इस तरह यदि हम तेल का इस्‍तेमाल करते समय उपरोक्‍त सावधारियॉं बरतें, तो आसानी से नकली तेल को पहचान सकते हैं और उससे होने वाले नुकसान से स्‍वयं को बचा सकते हैं।

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"साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" में पढें- 'श्रृष्टि व जीवन (वैदिक मत) कुछ शंकाएं'
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6.27.2009

देवराज इन्‍द्र को मिलने वाली है चुनौती


भारतीय मिथक कथाओं के अन्‍तर्गत यूँ तो आपने ऐसी अनेकानेक कहानियॉं पढ़ी व सुनी होंगी, जिसमें वर्षा के देवता इन्‍द्र को तरह तरह की चुनौतियां दी गयी थीं। ऐसे में वे क्रोधित हो जाते थे और अपने अस्‍त्र शस्‍त्र अथवा कूटनीति के द्वारा उसका समाधान निकालने में सफल हो जाते थे।

पर देवराज इन्‍द्र को एक बार फिर चुनौती मिलने वाली है। और यह चुनौती मिलने वाली है भारतीय मौसम वैज्ञानिकों की ओर से। जी हॉं, भारत सरकार के मौसम विभाग ने यह फैसला किया है कि इस बार मानसून के कमजोर होने के कारण खेती को बचाने के लिए क्‍लाउड सीडिंग अर्थात कृत्रिम वर्षा का सहारा लिया जाए।

इस योजना के अन्‍तर्गत वैज्ञानिकों का एक समूह बादलों के मध्‍य जाकर उसकी रासायनिक संरचना का अध्‍ययन करेगा। इस जांच का मुख्‍य उददेश्‍य रहेगा, ऐसे बादलों की पहचान करना, जिनका घनत्‍व अपेक्षाकृत कम हो और जिनके द्वारा बिना वर्षा किए निकल जाने की संभावना हो।

इस जांच के लिए एक विशेष विमान पर किराए पर लिया गया है। जांच में जिन बादलों को कमजोर पाया जाएगा, उनपर सिल्‍वर आयोडाइड और जमी हुई कार्बन डाई आक्‍साइड का छिड़काव करके उनके घनत्‍व को बढ़ाया जाएगा, जिससे उनका घनत्‍व बढ़ जाएगा और वे वर्षा के लिए मजबूर हो जाएंगे। आशा है भारत सरकार का यह प्रोजेक्‍ट सफल रहेगा और इस प्रकार कम वर्षा के कारण चौपट हो जाने वाली कृषि को बचाया जा सकेगा।
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"साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" में पढें- 'क्‍या यह श्रृष्टि का अंत है?'
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6.24.2009

क्‍या फिर होगा 1918 जैसा मौत का ताण्‍डव?

फ्लू का आतंक
पता नहीं आप को ज्ञात है अथवा नहीं, पर यही स्‍वाइन फ्लू 1918 में भयानक ताण्‍डव मचा चुका है। उस समय इस महामारी ने लगभग 10 लाख लोगों को मौत के घाट उतार दिया था। हालॉंकि आज चिकित्‍सा जगत में उसका पक्‍का इलाज खोजा जा चुका है और सामाजिक चेतना में भी काफी वृद्धि हुई है। फिरभी आज जिस तरह से यह बीमारी सम्‍पूर्ण विश्‍व में फैलती जा रही है, उससे यह डर लगने लगा है कि कहीं यह 1918 जैसा आतंक फिर न मचा दे।

सम्‍पूर्ण विश्‍व में लगभग चालीस हजार लोगों को अपनी गिरफ्त में ले चुका स्‍वाइन फ्लू अब तक 167 लोगों को मौत के घाट उतार चुका है। लेकिन दुख का विषय यह है कि लोग इसके बावजूद भी बेहद गैरजिम्‍मेदाराना हरकत कर रहे हैं। अभी पिछले दिनों लखनऊ में अमेरिका से आए एक युवक को शुरूआती लक्षण दिखने के बाद भी उसके घर वालों ने जिस तरीके से सरकारी डाक्‍टरों से असहयोग जताया और बिना बताए उसे दिल्‍ली भेज दिया, उससे इसकी रोकथाम में लगा सरकारी तंत्र भी हतप्रभ है।
हालॉंकि अभी हमारे देश में स्‍वाइन फ्लू के रोगियों की संख्‍या सिर्फ 50 तक ही पहुंची है, पर यह सोचकर चुप नहीं बैठा जा सकता। स्‍वाइन फ्लू की रोकथाम के लिए हम सबको सतर्क रहना होगा। क्‍योंकि यह कोई ऐसी बामारी नहीं है, जिसका इलाज न किया जा सके। पर चूंकि यह बीमारी संक्रमण के द्वारा फैलती है, इसलिए हमें चाहिए कि कोई भी चीज खाने से पहले हम कीटाणुनाशक साबुन से हाथ अवश्‍य धोएं। इसके अतिरिक्‍त यदि किसी भी व्‍यक्ति को खराश, दर्द, बुखार, कंपकंपी, शरीर में दर्द, उल्‍टी, डायरिया और जुकाम हो, तो इन्‍हें साधारण बीमारी मानकर अपने आप ही उसका इलाज न करने लगे। ऐसी दशा में किसी अच्‍छे डाक्‍टर को दिखाना ही उचित है। ध्‍यान रखें यह शुरूआती लक्षण स्‍वाइन फ्लू के भी हो सकते हैं।

यदि आपकी जानकारी में भी कोई ऐसा व्‍यक्ति है, जिनमें ये लक्षण हैं, तो उसे डाक्‍टर के पास जाने के लिए प्रेरित करें। यदि वह इसमें लापरवाही बरते, तो आप तत्‍काल पास के सरकारी अस्‍पताल अथवा जिम्‍मेदार सरकारी अफसर को इसकी सूचना दें। क्‍योंकि यदि आपके पड़ोसी को स्‍वाइन फ्लू हुआ और उसने इलाज में हीला हवाली की, तो उसका संक्रमण आप तक भी पहुंच सकता है।

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"साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन" में पढें- 'श्रृष्टि व जीवन (बृहमा द्वारा विनिर्माण प्रक्रिया)'
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6.22.2009

बेटी गयी, मकान गया, अब जान की है बारी?

तंत्र मंत्र के द्वारा किसी व्यक्ति को कोई फायदा हुआ है, इसका पुख्ता प्रमाण किसी के पास नहीं है, पर इसके चक्कर में लोगों को किस कद प्रताड़ना सहनी पड़ती है, इसका एक ताजा उदाहरण लखनऊ में फिर देखने को मिला है। और इसके शिकार हैं सिंचाई विभाग के सेवानिवृत्त मुख्य अभियन्ता श्री आर० के० पाठक।
इस काण्ड ने जहाँ रिश्तों की मर्यादा को तार तार कर दिया है, वहीं यह सवाल भी खड़ा किया है कि जब मुख्य अभियन्ता जैसे लोग तांत्रिकों के झांसे में आ रहे हैं, तो आम आदमी इस गर्त में कितने गहरे तक धंसा हुआ है, यह कैसे पता लगाया जाए।

यह मामला यूँ है कि श्री पाठक के तीन बेटियाँ हैं। बीच वाली लड़की की शादी नही होने पर उन्होंने बड़ी बेटी के श्वसुर के सुझाव पर तांत्रिक भारतेन्दु चतुर्वेदी से सम्पर्क किया। उसने मंझली लड़की की शादी अपने किसी परिचित से तो करा दी, पर जब छोटी लड़की की शादी की बात आई, तो उसने कहा कि इसकी कुण्डली में शादी का योग नहीं है। बाद में तांत्रिक ने छोटी लड़की, जो इंजीनियरिंग की स्कॉलर थी, को अपने प्रभाव में लेकर श्री पाठक से उनका मकान जबरन अपने नाम लिखवा लिया। धीरे धीरे तांत्रिक ने अपनी गतिविधियां कुछ इस तरह से फैलाईं कि श्री पाठक को मकान के एक कमरे में सिमटना पड़ा। बाद में तांत्रिक ने अपने श्वसुर को धमकाया और उनसे मकान में रहने के एवज में ११ हजार रूपये किराया मांगने लगा।

लेकिन पाठक साहब फिरभी अपना मुंह सिए अफसोस करते रहे। हद तो तब हो गयी, जब फरवरी में उन्हें मकान खाली करने का नोटिस मिला। कारण उनकी लड़की ने वह मकान किसी और को बेच दिया था। इस तरह जब पानी सर से ऊपर निकल गया, तो पाठक महोदय ने पुलिस की शरण ली। इस तरह से यह मामला लोगों के सामने आया है। पुलिस के हस्तक्षेप के बाद भी श्री पाठक बेहद घबराए हुए हैं। क्योंकि उन्हें डर है कि वह तांत्रिक मकान पर कब्जा करने के लिए उनके साथ किसी भी हद तक जा सकता है।

फिलहाल तांत्रिक फरार है। सुनने में आ रहा है कि वह नीदरलैण्ड चला गया है। इधर पाठक साहब कोर्ट कचेहरी के चक्कर में हैं और उधर तांत्रिक महोदय का पता नहीं। हो सकता है, नीदरलैण्ड में भी उसने एक आध ऐसी चेले फंसा रखे हों और उनको बेवकूफ बना कर मौज कर रहा हो।
अब आप ही बताएं कि पाठक जी को क्या कहा जाए? वैसे इतना तो तय है कि इस काण्ड के बहाने लोगों के सामने कुछ तो तांत्रिकों, बाबाओं की कुछ तो असलियत सामने आई ही है। इस बारे में आपका क्या विचार है?

और हाँ, आप सबसे निवेदन है कि “तस्लीम” पर चल रही चर्चा के बारे में अपनी संतुलित प्रतिक्रियाएं ही व्यक्त करें। और यदि आप इससे प्रेरित होकर इस विषय पर अपने ब्लॉग पर कुछ लिखते हैं, तो “तस्लीम” के पाठकों को कमेण्ट के द्वारा उससे अवश्य सूचित करें। जिससे वे लोग भी आपके विचारों से अवगत हो सकें और उनपर खुल कर अपनी राय दे सकें।
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